छत्तीसगढ़ के बस्तर में सालों पुरानी कई ऐतिहासिक गुफाएं हैं। इनमें से एक तीन जिलों की सरहद पर अबूझमाड़ में स्थित तुलार गुफा भी है। जिसे तुलार धाम कहा जाता है। यहां भगवान भोलेनाथ का वर्षों पुराना शिवलिंग स्थापित है। इसकी खास बात यह है कि 12 महीने चट्टानों से पानी रिसकर शिवलिंग पर गिरता है। लोगों का मानना है कि प्रकृति भगवान भोलेनाथ का 365 दिन जलाभिषेक करती है। साल में केवल एक बार महाशिवरात्रि के मौके पर ही भक्त भोलेनाथ के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
लेकिन यहां तक पहुंचना आसान नहीं है। पहली चुनौती नक्सल दशहत और दूसरी कई छोटी-बड़ी नदियों को पार करना पड़ता है। पथरीले पगडंडी भरे रास्तों को पार कर ही गुफा तक पहुंचा जाता है। आज महाशिवरात्रि के मौके पर भोलेनाथ के दर्शन करने के लिए श्रद्धालुओं का हुजूम गुफा में उमड़ पड़ा। आस-पास के गांव के सैकड़ों ग्रामीण तुलार गुफा पहुंचे, जिन्होंने शिवलिंग में जलाभिषेक किया। भोलेनाथ का दर्शन कर आशीर्वाद लिया। ग्रामीणों ने पारंपरिक वेशभूषा धारण कर ढोल बजा भजन-कीर्तन भी किया।
केवल दुपहिया वाहन से ही तुलार धाम तक पहुंचा जा सकता है। यहां पहुंचने के लिए सबसे पहले दंतेवाड़ा जिले के बारसूर आना पड़ता है। फिर यहां से इंद्रवती नदी पर सातधार पुल को पार करना पड़ता है। यहां तक सफर आसान है। लेकिन, मुश्किल सफर इसके बाद शुरू होता है। सातधार के बाद मंगनार नदी को पार कर गुफा गांव और फिर यहां से बूड़दुम, तोड़मा गांव होते हुए तुलार गुफा पहुंचा जाता है। सातधार से महज 28 किमी की ही तुलार गुफा की दूरी है। लेकिन सफर चुनौती भरा होने की वजह से काफी समय लग जाता है।
तुलार का जंगल पूरी तरह से नक्सलियों का गढ़ है। बताया जाता है कि इस इलाके में अक्सर माओवादियों का डेरा होता है। इसलिए यहां पर आम लोगों का पहुंचना काफी मुश्किल होता है। महाशिवरात्रि के मौके पर आस-पास गांव के ग्रामीण श्रद्धालुओं को कोई परेशानी न हो इसलिए तुलार धाम तक पहुंचने के लिए रास्ता बनाते हैं। जगह-जगह पेड़ों में चिन्ह लगाते हैं। ताकि कोई भी रास्ता न भटक सके।


