Thursday, February 19, 2026

लम्‍बे संघर्ष के बाद मिली जीत:60 साल बाद मिला न्याय, हाईकोर्ट ने भूमि अधिकार को किया सुरक्षित

60 साल से अपनी जमीन के लिए संघर्षरत व्यक्ति को न्याय मिला है। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के भूमि हक को सुरक्षित करने का आदेश दिया है। मामले की सुनवाई जस्टिस राजेंद्र चंद्र सिंह सामंत की सिंगल बेंच में हुई। मो. अमान रायपुर सदर बाजार के रहने वाले हैं। उन्होंने अधिवक्ता कमरुल अजीज के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दायर की। इसमें बताया कि याचिकाकर्ता के पिता शेख रहमान जो शेख रहिम के बेटे हैं ने 15 अप्रैल 1947 में कोटा में खसरा नंबर 19/1 और 159/1 में कुल 9.89 एकड़ कृषि भूमि खरीदने के लिए समझौता किया।

इसके बाद 3 फरवरी 1951 को जमीन की बिक्री अपने नाम से करवा ली और तब से वह उस भूमि पर काबिज हैं। इसी बीच जमींदारी उन्मूलन अधिनियम के अंतर्गत अवैधानिक रूप से उनकी जमीन को शासकीय घास भूमि के रूप में दर्ज कर दिया गया। इसके विरुद्ध याचिकाकर्ता के पिता ने कलेक्टर के समक्ष अधिनियम के अंतर्गत आवेदन प्रस्तुत कर उन्मूलन करने की मांग की।

जिस पर 23 मई 1964 को कलेक्टर ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ता के पिता के पक्ष में स्थानांतरण शून्य नहीं है। इस पर आयुक्त ने स्वत: संज्ञान लेकर मामले को सुना और 3 जुलाई 2002 को 1964 में पारित आदेश की पुष्टि की। इसके बाद शासन ने कहीं और अपील नहीं की तो इस आदेश ने अंतिम रूप ले लिया। इसके बाद याचिकाकर्ता के पिता ने तहसीलदार को अपने नाम पर भूमि दर्ज करने का आवेदन दिया।

जिसे यह कहते हुए खारिज कर दिया गया कि यह भूमि सरकारी शीर्ष के तहत घास भूमि दिखती है। यह भी बताया गया कि याचिकाकर्ता के पक्ष में बिक्री विलेख आज तक वैध है, इसलिए प्रतिवादी अधिकारी याचिकाकर्ता के पक्ष में उत्परिवर्तन से इनकार नहीं कर सकते। इसलिए आदेश को रद्द करने की मांग की गई। मामले को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने याचिका को स्वीकार कर राजस्व मंडल द्वारा पारित आदेश को रद्द कर अतिरिक्त आयुक्त द्वारा पारित आदेश को यथावत रखा।

उप मंडल अधिकारी ने खारिज की, अतिरिक्त आयुक्त ने स्वीकार किया
उप-मंडल अधिकारी के समक्ष एक अपील दायर की, जिसे 11 फरवरी 2011 को खारिज कर दिया गया। इसके बाद छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता 1959 की धारा 44 (2) के तहत अतिरिक्त आयुक्त के समक्ष अपील दायर की गई। अपील को 4 जनवरी 2013 के आदेश द्वारा स्वीकार किया गया। साथ ही अनुमंडल पदाधिकारी व तहसीलदार के आदेशों को खारिज कर दिया गया। इस पर राज्य शासन ने राजस्व बोर्ड के समक्ष संशोधन की अर्जी प्रस्तुत की। इस पर राजस्व बोर्ड ने 19 दिसंबर 2017 को पुनरीक्षण की अनुमति दी। साथ ही अतिरिक्त आयुक्त द्वारा पारित 4 जनवरी 2013 के आदेश को रद्द कर दिया।

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