चिंतन मनन

मां की चिट्ठी?
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मैं अनवी हु और ये बात तब की है जब मैं चौथी कक्षा में पढ़ती थी।
उस समय मेरी उम्र करीबन 9 वर्ष थी। पांच भाई बहनों में मैं चौथे नंबर पर थी ।
मुझसे छोटा एक भाई तन्विक जो मुझसे चार वर्ष छोटा था। अन्य भाई बहनों से छोटे होने के कारण हम दोनों ही मां के बहुत लाडले थे।मां का स्नेह हम दोनों को कुछ ज्यादा ही मिलता था।
मां को जब कभी बाहर जाना होता तो हम दोनो को साथ लेकर जाती थी क्योंकि उनके बिना रहना हमें अच्छा नहीं लगता था, एक तरह से मां के बिना रहने की कल्पना भी नहीं कर सकते थे हम,लेकिन एक बार छोटे मामा जी के घर बेटी पैदा हुई तो मां को मामी की देखभाल के लिए उनके घर जाना पड़ा ।
उन दिनों मेरी परीक्षाएं चल रही थी तो मां मुझे घर पर ही छोड़ गईं और छोटे भाई को साथ लेकर गई ।जब वो गईं मैंने पूरा घर रो रो कर सिर पे उठा लिया,लेकिन जैसे तैसे मां मुझे समझा बुझा कर घर पर ही छोड़ गईं।
जाते समय मां ने मुझे 20 रुपए दिए और कहा इन पैसों से अपने लिए हर रोज कुछ खाने के लिए ले आना
मैं भी कुछ समय बाद चुप हो गई और मां को जाने दिया, लेकिन जैसे ही दिन बीता और रात हुई मुझे मां की याद सताने लगी।
उन दिनों कोई फोन वैगरह भी नहीं था घर में,जिससे मां से बात हो सकती ।दिन बीतने लगे और मैं बिल्कुल चुपचाप सी रहने लगी ।
मां जो 20 रुपए देकर गई उनको भी खर्च नहीं किया मैंने, क्योंकि वो नोट मुझे मां की याद दिलाता और खुश होने की थोड़ी सी वजह भी देता ।
रोज मां को याद करना और छुप छुप कर रोना आदत सी हो गई थी।इसी तरह 12दिन बीत गए।
अगले दिन करीब दोपहर तीन बजे एक डाकिया घर आया और एक चिट्ठी घर के अंदर डाल दी मैं घर की बालकनी से सब देख रही थी। जल्दी से नीचे आकर मैंने वो चिट्ठी उठाई और पापा के हाथ में थमा दी।
पापा ने चिट्ठी खोली और पढ़ने लगे, वो चिट्ठी किसी और की नहीं बल्कि मां की ही थी ।मां ने सबसे पहली लाइन में ही मेरा हाल पूछा और मुझे बहुत सारा प्यार चिट्ठी में भरकर भेजा और साथ साथ जल्दी से जल्दी आने की सूचना भी दी। मां ने कहा, मेरी बच्ची हमेशा खुश रहना मैं जल्द ही वापिस आऊंगी।
मां की वो चिट्ठी मेरे लिए किसी खजाने से कम नहीं थी ऐसा लग रहा था जैसे मां सच में मेरे पास आ गई हों।फिर तो रोज कई कई बार मैं उस चट्टी को पढ़ती और खुश रहती।अब वो दिन भी आ गया था जब मां घर आने वाली थी मुझसे एक मिनट का भी सब्र नहीं हो रहा था और मां घर आ चुकी थी। सबसे पहले आते ही मां ने मुझे गोद में उठाया और जाने कितनी बार मेरे माथे को चूमा। खुशी के मारे मां की आंखे नम हो गईं थी तब समझ नहीं आया था कि मां क्यूं रो रही थी लेकिन अब सब समझ आता है ।

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