चिंतन मनन

गुरु की शिक्षा का मर्म
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एक बार एक नवदीक्षित शिष्य ने अपने गुरु से कहा, “गुरुदेव, मेरा भी मन करता है कि आपकी तरह मेरे भी कई शिष्य हों और सभी मुझे भी आप जैसा ही मान-सम्मान दें।”
गुरु ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया, “कई वर्षों की लंबी साधना के बाद तुम्हें भी एक दिन यह सब प्राप्त हो सकता है।”
शिष्य ने उत्साहित होकर पूछा, “इतने वर्षों बाद क्यों? मैं अभी ही अपने शिष्यों को दीक्षा क्यों नहीं दे सकता?”
गुरु ने शिष्य को समझाने के लिए एक उपाय सोचा। उन्होंने शिष्य को तख्त से उतरकर नीचे खड़ा होने को कहा और फिर स्वयं तख्त पर खड़े होकर बोले, “जरा मुझे ऊपर वाले तख्त पर पहुंचा दो।”
शिष्य ने गुरु को ऊपर तख्त पर ले जाने का भरसक प्रयास किया, लेकिन असफल रहा। शिष्य ने तब गुरु के संकेत को समझा। गुरु ने समझाया कि जब तक हम स्वयं उच्च स्तर पर नहीं पहुंच जाते, तब तक हम किसी और को उस स्तर पर नहीं पहुंचा सकते। सही दिशा में कई वर्षों की साधना और निष्ठा के बाद ही हम वह स्तर प्राप्त कर सकते हैं जहां हम दूसरों को मार्गदर्शन दे सकें।
शिष्य ने गुरु की इस सीख को समझते हुए उनके चरणों में गिरकर अपने अज्ञानता और जल्दबाजी के लिए माफी मांगी।
सच्ची महानता और सम्मान प्राप्त करने के लिए धैर्य, साधना और निष्ठा की आवश्यकता होती है। *किसी की नकल या शॉर्टकट के माध्यम से सफलता प्राप्त नहीं की जा सकती।

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