*हमेशा सत्य पर चले *
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एक धनवान सेठ भगवान विष्णु के परम भक्त थे। वह हमेशा सच बोला करते थे। एक बार श्रीहरि लक्ष्मी देवी से अपने भक्त सेठ के सत्यवादिता की खूब प्रशंसा कर रहे थे।
लक्ष्मी देवी ने कहा, “आप इस सेठ की इतनी प्रशंसा करते हैं, क्यों ना उसकी परीक्षा ली जाए और परखा जाए कि वह स्वयं श्रीहरि के मुख से इतनी प्रशंसा के योग्य है भी या नहीं?
भगवान लक्ष्मीजी की बात मान गए। उन्होंने कहा, “देवी! अभी सेठ गहरी निद्रा में सो रहा है। आप उसके स्वप्न में जाएं और उसकी परीक्षा लेकर अपनी शंका मिटा लें। अगले ही क्षण सेठ जी को एक स्वप्न आया। स्वप्न में देवी लक्ष्मी उनके सामने आईं और बोलीं, “हे मनुष्य! मैं धन की देवी लक्ष्मी हूँ। तुमसे संवाद करने आई हूँ।
सेठ को यकीन नहीं हो रहा था। उसने कहा, “माता आपने साक्षात दर्शन देकर मेरा जीवन धन्य कर दिया है। आदेश करिए मैं आपकी प्रसन्नता के लिए कर सकता हूँ? देवी ने कहा, “मैं तो बस इतना बताने आई हूँ कि मेरा स्वभाव चंचल है। वर्षों से तुम्हारे भवन में निवास करते-करते मैं ऊब चुकी हूँ, इसलिए अब यहाँ से जा रही हूँ।
सेठ बोला, “विनती है कि आप यहीं रहें, किन्तु अगर आपको यहाँ अच्छा नहीं लग रहा है तो मैं आपको कैसे रोक सकता हूँ। जो उचित लगे आप वही करें। लक्ष्मी जी उसके घर से चली गईं। थोड़ी देर बाद वेश बदलकर लक्ष्मीजी ने यश का रूप धरा और पुनः सेठ के स्वप्न में आकर बोलीं, “सेठ मुझे पहचान रहे हो?
सेठ ने कहा कि वह उसे नहीं पहचानता। यश वेशधारी लक्ष्मी ने कहा, “मैं यश हूँ, मेरे ही कारण तुम्हें कीर्ति और यश मिला है। लेकिन जब लक्ष्मी जी यहाँ से चली गईं तो मेरा क्या काम !! अब मैं तुम्हारे साथ नहीं रहना चाहता।
सेठ ने कहा, “ठीक है, यदि आप भी जाना चाहते हैं तो वही सही। आप मेरे घर में वास करते तो अच्छा था, पर आपको बलपूर्वक तो रोक नहीं सकता। आपको जो उचित लगे वही करें। सेठ ने स्वप्न में देखा कि वह दरिद्र हो गए हैं। धन और यशहीन होने के कारण लोग उनसे कतराने लगे हैं। सदैव उनकी चापलूसी करने वाले भी अब उनकी बुराई करने लगे हैं।
थोड़ी देर बाद लक्ष्मी जी धर्म का रूप धारण कर पुनः सेठ के सपने में आईं और बोलीं, “मैँ धर्म हूँ। लक्ष्मी व यश के जाने के बाद दरिद्रता में मैं तुम्हारा साथ नहीं दे सकता। मैं जा रहा हूँ। सेठ ने फिर वही बातें दोहराईं, “आप न जाते तो अच्छा रहता। लेकिन इच्छा के विरुद्ध आपको रोकना अनुचित होगा। इसलिए जैसी आपकी इच्छा।
धर्म भी सेठ
के घर से चला गया।
कुछ देर बाद माँ लक्ष्मी ने सत्य का रूप लिया। सेठ के स्वप्न में प्रकट हुईं और बोलीं, “मैँ सत्य हूँ। लक्ष्मी, यश और धर्म के जाने के बाद अब मैं भी यहाँ से जाना चाहता हूँ। इतना सुनते ही सेठ ने तुरंत सत्य के पाँव पकड़ लिए और बोले, “मैं आपको जाने नहीं दे सकता। भले ही सब मेरा साथ छोड़ दें पर कृपया आप ऐसा न करिए। सत्य विहीन होकर मैं एक क्षण भी नहीं रह सकता। यदि आप गए तो मैं तत्काल अपने प्राण त्याग दूँगा।
सत्य ने प्रश्न किया, “तुमने बाकी तीनों को बड़ी आसानी से जाने दिया और मुझे जबरदस्ती रोक रहे हो, मेरे साथ यह व्यवहार क्यों? तुमने इसी तरह उन्हें क्यों नहीं रोका? सेठ बोले, “मेरे लिए वे तीनों भी बहुत महत्त्व रखते हैं लेकिन उनसे वंचित होकर भी मैं भगवान का नाम जपता हुआ उद्देश्यपूर्ण जीवन जी सकता हूँ।
परन्तु यदि आप चले गए तो मेरे जीवन में झूठ प्रवेश कर जाएगा। वाणी अशुद्ध हो जाएगी। ऐसी वाणी से मैं प्रभु की वंदना नहीं कर सकूँगा। इसलिए आपके बिना तो मैं अपनी कल्पना ही नहीं कर सकता।
सेठ के उत्तर से सत्य प्रसन्न हुआ। उसने कहा, “तुम्हारी अटूट भक्ति ने मुझे यहाँ रूकने पर विवश कर दिया। अब मै यहाँ से कभी नहीं जाऊँगा। ऐसा कहकर सत्य अंतर्ध्यान हो गया।सेठ अभी भी निद्रा में ही थे। थोड़ी देर बाद स्वप्न में धर्म वापस आया और बोला, “मैं अब तुम्हारे पास ही रहूँगा क्योंकि यहाँ सत्य का निवास है।
सेठ ने धर्म का स्वागत किया।उसके तुरंत बाद यश भी लौट आया और बोला, “जहाँ सत्य और धर्म है वहाँ यश स्वतः ही आ जाता है, इसलिए अब मैं भी तुम्हारे साथ ही रहूँगा।
सेठ ने यश की भी आवभगत की।अंत में लक्ष्मी देवी आईं। सेठ ने प्रणाम कर पूछा, “माता !! क्या आप भी पुनः मुझ पर कृपा करेंगी?
*माता ने उत्तर दिया, “जहाँ सत्य, धर्म और यश हों, वहाँ मेरा वास निश्चित है, यह सुनते ही सेठ की नींद खुल गयी। उन्हें यह सब स्वप्न लगा लेकिन अपनी धर्मपरायणता पर उनका विश्वास पहले से ज्यादा बढ़ गया lll


