दोषों में भी गुण
*ढूँढ़ निकालिये –
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सड़े गले कूड़े करकट का जब खाद रूप से सोना कमाया जा सकता है तो कोई कारण नहीं कि घटिया स्वभाव के आदमियों से भी यदि हम बुद्धिमत्ता पूर्ण व्यवहार करें तो उनसे सज्जनता की प्रतिक्रिया प्राप्त न हो।
जब साँप, रीछ और बन्दर जैसे अनुपयोगी जानवरों को सिखा पढ़ा कर लोग उनसे तमाशा कराते और धन कमाते हैं तो कोई कारण नहीं कि हम बुरे, ओछे और मूर्ख समझे जाने वाले लोगों को अपने लिए हानिकारक सिद्ध होने देने की अपेक्षा उन्हें उपयोगी लाभ दायक न बना सकें। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हमारा निज का दृष्टिकोण और स्वभाव सही हो।
यदि वही गलत है, यदि हम अपनी निज की दुर्बलताओं के प्रवाह में बहते हैं और छोटे-छोटे कारणों को बहुत बड़ा रूप देकर कुछ-कुछ समझने लगने की भूल करते हैं, सामने वाले में केवल दोष ही दोष ढूँढ़ते हैं, तो वही मिलेगा जो हमने ढूँढ़ा था।
दोष विहीन कोई वस्तु नहीं, यदि हम दोष ढूंढ़ने की आदत से ग्रसित हो रहे हैं और किसी के प्रति दुर्भावपूर्ण भावना बनाये हुए हैं तो उसके जितने दोष हैं वे सब बहुत ही बड़े-बड़े रूप में दिखाई देंगे और वह व्यक्ति दोषों के पर्वत जैसा दीखेगा।
यदि इसके विपरीत हमारा दृष्टिकोण उसी व्यक्ति के प्रति आत्मीयता पूर्ण रहा होता, उसकी सज्जनता पर विश्वास करते तो उसमें अनेकों गुण ऐसे दिखाई देते जिससे उसे सज्जन एवं सत्पुरुष कहने को ही जी चाहता।
भूल हर किसी से होती है। दुर्गुणों और दुर्बलताओं से रहित भी कोई नहीं है। पर जिसे हम प्यार करते हैं, उनकी भूलों पर ध्यान नहीं देते या उन्हें बहुत छोटी मानते हैं, यदि कोई बड़ी भूल भी होती है तो उसे हंसकर सहन कर लेते हैं और उदारतापूर्वक क्षमा कर देते हैं।
*यह अपनी भावनाओं का ही खेल है कि दूसरों की बुराई या भलाई बहुत छोटी हो जाती है या अनेकों गुनी बढ़ी-चढ़ी दीखती है।


